केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में संशोधन को दी मंजूरी


इस प्रस्ताव में किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में संशोधन किया गया है ताकि बच्चों के सर्वोत्तम हित को सुनिश्चित करने के लिए बाल संरक्षण को मजबूत करने के उपायों को लागू किया जा सके.

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 17 फरवरी, 2021 को महिला और बाल विकास मंत्रालय के किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में संशोधन के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है.

प्रस्तावित संशोधन

• इन संशोधनों में अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट सहित जिला मजिस्ट्रेट को अधिकृत करना शामिल है ताकि मामलों के त्वरित निपटान सुनिश्चित करने और जवाबदेही बढ़ाने के लिए जेजे अधिनियम की धारा 61 के तहत गोद लेने के आदेश जारी किए जा सकें.
• इस संशोधन में प्रस्तावित नए उपायों के सुचारू कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए जिलाधिकारियों को सशक्त बनाने का प्रस्ताव भी है.
• किसी संकट की स्थिति में बच्चों के पक्ष में प्रयासों के समन्वय के लिए जिला मजिस्ट्रेटों को भी सशक्त बनाया जाएगा.
• यह प्रस्ताव पहले के अपरिभाषित अपराधों को 'गंभीर अपराध' के रूप में वर्गीकृत करता है और CWC सदस्यों की नियुक्ति के लिए पात्रता मानदंडों को परिभाषित करता है.
• इन प्रस्तावित संशोधनों के तहत अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के कार्यान्वयन में आने वाली कई कठिनाइयों का भी समाधान किया गया है.

किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015: मुख्य विवरण

• बाल अधिकार बिरादरी द्वारा इसके कई प्रावधानों पर गहन विवाद, बहस और विरोध के बीच, 22 दिसंबर, 2015 को भारतीय संसद द्वारा किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 पारित किया गया था. यह 15 जनवरी, 2016 को लागू हुआ. 
• इस अधिनियम ने भारतीय किशोर अपराध कानून - किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2000 की जगह ले ली है.
• यह अधिनियम 16-18 वर्ष की आयु के बीच के ऐसे किशोरों के संबंध में, जो जघन्य अपराधों में शामिल हैं, यह अनुमति देता है कि उन किशोरों को वयस्कों के तौर पर आजमाया जा सकता है.
• यह अधिनियम, अभिभावक और वार्ड अधिनियम (1890) (मुसलमानों पर लागू) और हिंदू दत्तक ग्रहण और रखरखाव अधिनियम (1956), जो हिंदुओं, जैन, बौद्ध और सिख लोगों के लिए लागू है) को हटाकर, भारत के लिए एक सार्वभौमिक तौर पर सुलभ दत्तक कानून बनाने का भी प्रयास करता है. हालांकि यह उन्हें प्रतिस्थापित नहीं करता है. 

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